अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ रही है। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की हालिया इकोरैप रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक, अगले 10 कारोबारी दिनों में ब्रेंट क्रूड का भाव 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। ऐसा होने पर भारत के लिए कच्चा तेल खरीदना महंगा हो सकता है, जिसका असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के बजट पर पड़ने की आशंका है।
अगले 10 कारोबारी दिनों में $110 तक पहुंच सकता है ब्रेंट क्रूड
SBI रिसर्च के अनुसार, निकट भविष्य में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट की संभावना नहीं दिख रही है। रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि अगले 10 कारोबारी दिनों में ब्रेंट क्रूड का भाव 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और दुनिया भर में सप्लाई चेन में आ रही रुकावटों के कारण कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना हुआ है।
अगर ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचता है, तो भारत जिस कच्चे तेल को खरीदता है, यानी इंडियन बास्केट, उसकी कीमत बढ़कर 127 से 130 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है।
पेट्रोल-डीजल और राशन महंगा होने का कितना खतरा?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 80-85% कच्चा तेल दूसरे देशों से आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने से भारत के आयात खर्च पर दबाव पड़ सकता है।
कच्चा तेल महंगा होने का असर आम लोगों पर कई तरह से पड़ सकता है।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर असर
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से पेट्रोल और डीजल की लागत पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, घरेलू बाजार में इनके खुदरा दाम बढ़ेंगे या नहीं, यह अलग-अलग परिस्थितियों और तेल कंपनियों के फैसलों पर भी निर्भर करेगा।
महंगाई बढ़ने की आशंका
डीजल का इस्तेमाल माल ढुलाई और कई दूसरी गतिविधियों में होता है। ऐसे में ईंधन की लागत बढ़ने पर सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना महंगा हो सकता है। इसका असर रोजमर्रा की चीजों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
हालांकि, कच्चे तेल में तेजी आने का मतलब यह नहीं है कि राशन और सभी जरूरी सामान तुरंत महंगे हो जाएंगे। वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल की कीमतें कितनी बढ़ती हैं और कितने समय तक ऊंची बनी रहती हैं।
रुपये पर बढ़ सकता है दबाव
भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने पर आयात के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा की जरूरत पड़ सकती है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
रुपये और बाजार को संभालने के लिए क्या कदम उठाए गए?
रिपोर्ट में रुपये की स्थिति मजबूत करने और बाजार में स्थिरता लाने के लिए उठाए गए कुछ कदमों का भी जिक्र है।
- बैंकों के लिए न्यूनतम दैनिक कैश रिजर्व रेशियो बनाए रखने की सीमा 90% से बढ़ाकर 99% कर दी गई है।
- IOCL, HPCL और BPCL जैसी सरकारी तेल कंपनियों को विदेशी मुद्रा भंडार से सीधे डॉलर बेचे जा रहे हैं। इससे खुले बाजार में हर महीने डॉलर की मांग 10-12 अरब डॉलर तक कम होने की उम्मीद है।
- 25,000 करोड़ रुपये की सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री की योजना भी बताई गई है।
इन कदमों का उद्देश्य बाजार में स्थिरता बनाए रखने और रुपये पर पड़ने वाले दबाव को संभालने में मदद करना है।
3 नवंबर से पहले कच्चे तेल की कीमतों पर क्या है अनुमान?
SBI रिसर्च का अनुमान है कि 3 नवंबर से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमत काफी हद तक सीमित दायरे में रह सकती है। इस दौरान मामूली गिरावट की संभावना भी जताई गई है।
हालांकि, पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक सप्लाई में रुकावटों के कारण कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर क्या असर पड़ेगा?
रिपोर्ट के मुताबिक, दबाव के बावजूद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार संभावित जरूरतों और अचानक पैदा होने वाली परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त है।
हालांकि, वित्त वर्ष 2027 में भुगतान संतुलन का अधिशेष घटकर 55-60 अरब डॉलर रहने का अनुमान जताया गया है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत के आयात खर्च, रुपये और महंगाई के लिए चुनौती बन सकती है। लेकिन पेट्रोल-डीजल या रोजमर्रा की चीजों की कीमतों में कितना बदलाव होगा, यह आने वाले समय में बाजार की स्थिति और संबंधित फैसलों पर निर्भर करेगा।
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